पुस्तकालयसङ्कल्पकल्पद्रुम
vaishnava
सङ्कल्पकल्पद्रुम
«सङ्कल्पकल्पद्रुम» — जीव गोस्वामी का काव्य, ७३२ श्लोक। वृन्दावन में एक वृद्ध अपने ही मन से कहता है: «तू मर रहा है, मूढ़; यह गुप्त अमृत पी» — और उसे सङ्कल्प करने को कहता है कि वह कौन-सी सेवा चाहता है। फिर वही सङ्कल्प खुलता है: जन्मादि-लीला, नित्य-लीला, सर्वर्तु-लीला और अन्त में फल-निष्पत्ति।
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