भगवद्गीता
श्रद्धा-त्रय-विभाग-योग (तीन प्रकार की श्रद्धा के भेद का योग)17.15
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भगवद्गीता · 17.15
देवनागरी

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

लिप्यंतरण (IAST)

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ ca yat |
svādhyāyābhyasanaṁ caiva vāṅ-mayaṁ tapa ucyate ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
अनुद्वेगकरम्anudvega-karamउद्वेग (उद्वेग) उत्पन्न न करने वाली (अ-करम्)।
वाक्यम्vākyamवाणी, वचन।
सत्यम्satyamसत्य।
प्रियहितम् च यत्priya-hitam ca yatऔर जो (यत्) प्रिय (प्रिय) और हितकारी (हितम्) हो।
स्वाध्यायाभ्यसनम्svādhyāya-abhyasanamशास्त्रों (स्वाध्याय) का नियमित अध्ययन (अभ्यासनम्)।
च एवca evaतथा।
वाङ्मयम्vāṅ-mayamवाणी से बनी, वाचिक।
तपःtapaḥतप।
उच्यतेucyateकहा जाता है।
अनुवाद

“जो वाणी उद्वेग न उत्पन्न करने वाली, सत्य, प्रिय और हितकारी हो, तथा शास्त्रों का नियमित स्वाध्याय — यही वाणी का तप कहलाता है।”

संस्करण

ff9c658b4266 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

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