भगवद्गीता
श्रद्धा-त्रय-विभाग-योग (तीन प्रकार की श्रद्धा के भेद का योग)17.19
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भगवद्गीता · 17.19
देवनागरी

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम् ॥

लिप्यंतरण (IAST)

mūḍha-grāheṇātmano yat pīḍayā kriyate tapaḥ |
parasyotsādanārthaṁ vā tat tāmasam udāhṛtam ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
मूढग्राहेणmūḍha-grāheṇaमूर्खतापूर्ण (मूढ) हठ से।
आत्मनः यत् पीडयाātmanaḥ yat pīḍayāजो (यत्) स्वयं को (आत्मनः) पीड़ा देकर (पीडया)।
क्रियते तपःkriyate tapaḥतप (तपः) किया जाता है (क्रियते)।
परस्य उत्सादनार्थम्parasya utsādana-arthamअथवा दूसरे (परस्य) के विनाश (उत्सादन) के लिए (अर्थम्)।
वाअथवा।
तत् तामसम्tat tāmasamवह तामसिक।
उदाहृतम्udāhṛtamकहा जाता है।
अनुवाद

“जो तप मूर्खतापूर्ण हठ से, स्वयं को कष्ट देकर, अथवा दूसरे के विनाश के उद्देश्य से किया जाता है, वह तमस् गुण का कहलाता है।”

संस्करण

a6c448ea7ee5 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

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