भगवद्गीता
दैवासुर-संपद-विभाग-योग (दैवी और आसुरी गुणों के भेद का योग)16.13-16
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भगवद्गीता · 16.13-16
देवनागरी

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम् ।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि ।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥
आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः ।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ ॥

लिप्यंतरण (IAST)

aneka-citta-vibhrāntā moha-jāla-samāvṛtāḥ |
prasaktāḥ kāma-bhogeṣu patanti narake 'śucau ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
अनेकचित्तविभ्रान्ताःaneka-citta-vibhrāntāḥवे जिनका मन (चित्त) अनेक (अनेक) [चिन्ताओं] से विभ्रान्त (विभ्रान्ताः) है।
मोहजालसमावृताःmoha-jāla-samāvṛtāḥमोह (मोह) के जाल (जाल) में फँसे हुए (समावृताः)।
प्रसक्ताःprasaktāḥअत्यधिक आसक्त।
कामभोगेषुkāma-bhogeṣuइन्द्रिय-सुखों में (काम-भोगेषु)।
पतन्तिpatantiवे गिरते हैं।
नरकेnarakeनरक में।
अशुचौaśucauअपवित्र में।
अनुवाद

“असंख्य चिन्ताओं से विमूढ़, मोह के जाल में फँसे हुए और इन्द्रिय-सुखों में अत्यधिक आसक्त, वे अपवित्र नरक में गिर पड़ते हैं।”

संस्करण

53cb2c160d75 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

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