भगवद्गीता
भक्ति-योग (भक्ति सेवा का योग)12.11
455 / 655
भगवद्गीता · 12.11
देवनागरी

अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः ।
सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥

लिप्यंतरण (IAST)

athaitad apy aśakto 'si kartuṁ mad-yogam āśritaḥ |
sarva-karma-phala-tyāgaṁ tataḥ kuru yatātmavān ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
अथ एतत् अपिatha etat apiयदि किंतु यह भी।
अशक्तः असिaśaktaḥ asiतू असमर्थ है (अशक्त)।
कर्तुम्kartumकरने में।
मद्योगम् आश्रितःmat-yogam āśritaḥमुझमें योगयुक्त होकर।
सर्वकर्मफलत्यागम्sarva-karma-phala-tyāgamसमस्त (सर्व) कर्मों (कर्म) के फलों (फल) का त्याग (त्याग)।
ततःtataḥतब।
कुरुkuruकर।
यतात्मवान्yata-ātmavānआत्मसंयमी।
अनुवाद

“किंतु यदि तू यह भी — मुझमें योगयुक्त होकर कर्म करना — करने में असमर्थ है, तो आत्मसंयमी होकर बस अपने समस्त कर्मों के फलों का त्याग कर दे।”

संस्करण

06c325693537 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से