भगवद्गीता
अक्षर-ब्रह्म-योग (अविनाशी ब्रह्म का योग)8.22
316 / 655
भगवद्गीता · 8.22
देवनागरी

पुरुषः स परः पार्थ भक्त्या लभ्यस्त्वनन्यया ।
यस्यान्तःस्थानि भूतानि येन सर्वमिदं ततम् ॥

लिप्यंतरण (IAST)

puruṣaḥ sa paraḥ pārtha bhaktyā labhyas tv ananyayā |
yasyāntaḥsthāni bhūtāni yena sarvam idaṁ tatam ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
पुरुषः सः परःpuruṣaḥ saḥ paraḥवह परम पुरुष।
पार्थpārthaहे पार्थ!
भक्त्याbhaktyāभक्ति, भक्तिपूर्ण सेवा से।
लभ्यः तुlabhyaḥ tuपरन्तु प्राप्य।
अनन्ययाananyayāअनन्य, शुद्ध।
यस्य अन्तःस्थानिyasya antaḥ-sthāniजिसके (यस्य) भीतर (अन्तः) स्थित हैं।
भूतानिbhūtāniसमस्त जीव।
येनyenaजिसके द्वारा।
सर्वम् इदम्sarvam idamयह सब [सृष्टि]।
ततम्tatamव्याप्त है।
अनुवाद

“हे पार्थ, उस परम पुरुष को, जिसमें समस्त प्राणी निवास करते हैं और जो सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं, केवल अनन्य भक्ति (भक्ति) के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।”

संस्करण

c5c9cee30ef1 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से