भगवद्गीता
अक्षर-ब्रह्म-योग (अविनाशी ब्रह्म का योग)8.24
318 / 655
भगवद्गीता · 8.24
देवनागरी

अग्निर्ज्योतिरहः शुक्लः षण्मासा उत्तरायणम् ।
तत्र प्रयाता गच्छन्ति ब्रह्म ब्रह्मविदो जनाः ॥

लिप्यंतरण (IAST)

agnir jyotir ahaḥ śuklaḥ ṣaṇ-māsā uttarāyaṇam |
tatra prayātā gacchanti brahma brahma-vido janāḥ ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
अग्निः ज्योतिःagniḥ jyotiḥअग्नि, प्रकाश।
अहःahaḥदिन।
शुक्लःśuklaḥशुक्ल [पक्ष]।
षण्मासाःṣaṭ-māsāḥछह मास।
उत्तरायणम्uttarāyaṇamउत्तरायण (जब सूर्य उत्तर की ओर गमन करता है)।
तत्रtatraउस [काल] में।
प्रयाताःprayātāḥजो प्रयाण करते हैं।
गच्छन्तिgacchantiवे जाते हैं।
ब्रह्मbrahmaब्रह्म को।
ब्रह्मविदः जनाःbrahma-vidaḥ janāḥब्रह्म को जानने वाले (विद्) लोग (जन)।
अनुवाद

“जो ब्रह्म को जानते हैं, वे अग्निदेव के प्रभावकाल में, प्रकाश में, दिन के शुभ समय में, शुक्ल पक्ष के पखवाड़े में तथा उन छह मासों में जब सूर्य उत्तर की ओर गमन करता है, इस जगत् से प्रयाण करते हुए ब्रह्म को प्राप्त होते हैं।”

संस्करण

1f9d453d306c · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से