भगवद्गीता
अक्षर-ब्रह्म-योग (अविनाशी ब्रह्म का योग)8.26
320 / 655
भगवद्गीता · 8.26
देवनागरी

शुक्लकृष्णे गती ह्येते जगतः शाश्वते मते ।
एकया यात्यनावृत्तिमन्ययावर्तते पुनः ॥

लिप्यंतरण (IAST)

śukla-kṛṣṇe gatī hy ete jagataḥ śāśvate mate |
ekayā yāty anāvṛttim anyayāvartate punaḥ ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
शुक्लकृष्णेśukla-kṛṣṇeशुक्ल (शुक्ल) और कृष्ण (कृष्ण)।
गतीgatīदो मार्ग।
हि एतेhi eteनिश्चय ही ये।
जगतःjagataḥ[इस] जगत् के लिए।
शाश्वतेśāśvateशाश्वत।
मतेmateमाने जाते हैं।
एकयाekayāएक [मार्ग] से।
यातिyātiवह जाता है।
अनावृत्तिम्anāvṛttimअनावृत्ति को।
अन्ययाanyayāदूसरे से।
आवर्तते पुनःāvartate punaḥवह पुनः लौट आता है।
अनुवाद

“वेदों के अनुसार ये दो मार्ग — शुक्ल और कृष्ण — इस जगत् में शाश्वत रूप से विद्यमान हैं। एक मार्ग से चलकर मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होता है, तथा दूसरे से चलकर वह पुनः लौट आता है।”

संस्करण

d36f7f4cd364 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से