भगवद्गीता
गुण-त्रय-विभाग-योग (प्रकृति के तीन गुणों के भेद का योग)14.15
509 / 655
भगवद्गीता · 14.15
देवनागरी

रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते ।
तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते ॥

लिप्यंतरण (IAST)

rajasi pralayaṁ gatvā karma-saṅgiṣu jāyate |
tathā pralīnas tamasi mūḍha-yoniṣu jāyate ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
रजसिrajasiरजस् में।
प्रलयम् गत्वाpralayam gatvāमरकर, मृत्यु पाकर।
कर्मसङ्गिषुkarma-saṅgiṣuकर्म (कर्म) में आसक्त (सङ्गिषु) लोगों के बीच।
जायतेjāyateवह जन्म लेता है।
तथाtathāउसी प्रकार, वैसे ही।
प्रलीनः तमसिpralīnaḥ tamasiजो तमस् में मरता है।
मूढयोनिषुmūḍha-yoniṣuअविवेकी (मूढ) योनियों में (योनिषु)।
जायतेjāyateवह जन्म लेता है।
अनुवाद

“जो रजोगुण में मृत्यु पाता है, वह उन लोगों के बीच जन्म लेता है जो फल की कामना से कर्म में आसक्त हैं। और जो तमोगुण में मृत्यु पाता है, वह अविवेकी प्राणियों के शरीरों में जन्म लेता है।”

संस्करण

226828bbef1a · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से