भगवद्गीता
ज्ञान-विज्ञान-योग (ज्ञान और उसकी उपलब्धि का योग)7.3
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भगवद्गीता · 7.3
देवनागरी

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥

लिप्यंतरण (IAST)

manuṣyāṇāṁ sahasreṣu kaścid yatati siddhaye |
yatatām api siddhānāṁ kaścin māṁ vetti tattvataḥ ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
मनुष्याणाम्manuṣyāṇāmमनुष्यों में से।
सहस्रेषुsahasreṣuहज़ारों में।
कश्चित्kaścitकोई एक, विरला।
यततिyatatiप्रयत्न करता है, यत्न करता है।
सिद्धयेsiddhayeसिद्धि के लिए।
यतताम् अपिyatatām apiऔर यत्न करने वालों में भी।
सिद्धानाम्siddhānāmऔर सिद्धों में से।
कश्चित्kaścitकोई एक, विरला।
माम्māmमुझे।
वेत्तिvettiजानता है, समझता है।
तत्त्वतःtattvataḥयथार्थ रूप में, वास्तविक स्वरूप में।
अनुवाद

“हज़ारों मनुष्यों में से कोई विरला ही सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है। और जो प्रयत्न करते हैं तथा सिद्धि को प्राप्त भी हो चुके हैं, उनमें से भी कोई विरला ही मुझे यथार्थ रूप में जानता है।”

संस्करण

cfec748b2ae5 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

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