भगवद्गीता
ज्ञान-विज्ञान-योग (ज्ञान और उसकी उपलब्धि का योग)7.19
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भगवद्गीता · 7.19
देवनागरी

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते ।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥

लिप्यंतरण (IAST)

bahūnāṁ janmanām ante jñānavān māṁ prapadyate |
vāsudevaḥ sarvam iti sa mahātmā sudurlabhaḥ ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
बहूनाम्bahūnāmअनेक।
जन्मनाम्janmanāmजन्मों के।
अन्तेanteअन्त में।
ज्ञानवान्jñānavānजो सच्चे ज्ञान से युक्त है।
माम्māmमेरी।
प्रपद्यतेprapadyateवह शरण लेता है।
वासुदेवःvāsudevaḥवासुदेव (कृष्ण)।
सर्वम् इतिsarvam itiसब कुछ है।
सः महात्माsaḥ mahātmāऐसी महात्मा।
सुदुर्लभःsu-durlabhaḥअत्यन्त (सु) दुर्लभ (दुर्लभ)।
अनुवाद

“अनेक जन्मों के अन्त में जो सचमुच ज्ञानवान् है, वह “वासुदेव [कृष्ण] ही सब कुछ है” — यह जानकर मेरी शरण में आता है। ऐसी महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।”

संस्करण

e003a0b98a3a · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

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