भगवद्गीता
ज्ञान-विज्ञान-योग (ज्ञान और उसकी उपलब्धि का योग)7.24
290 / 655
भगवद्गीता · 7.24
देवनागरी

अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥

लिप्यंतरण (IAST)

avyaktaṁ vyaktim āpannaṁ manyante mām abuddhayaḥ |
paraṁ bhāvam ajānanto mamāvyayam anuttamam ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
अव्यक्तम्avyaktamअव्यक्त, निराकार को।
व्यक्तिम् आपन्नम्vyaktim āpannamव्यक्ति रूप को प्राप्त (आपन्न) हुआ।
मन्यन्तेmanyanteवे मानते हैं।
माम्māmमुझे।
अबुद्धयःabuddhayaḥबुद्धिहीन, अल्पज्ञ।
परम् भावम्param bhāvamमेरी परा (परम) प्रकृति (भाव)।
अजानन्तःajānantaḥन जानते हुए।
ममmamaमेरी।
अव्ययम्avyayamअविनाशी।
अनुत्तमम्anuttamamऔर अनुत्तम।
अनुवाद

“अल्पज्ञ लोग, मेरी परा, अविनाशी और अनुत्तम प्रकृति को न जानते हुए, मुझ अव्यक्त को इस व्यक्त स्वरूप को धारण किया हुआ मानते हैं।”

संस्करण

03d5f5928046 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से