भगवद्गीता · 18.6
॥
देवनागरी
एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा फलानि च ।
कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम् ॥
लिप्यंतरण (IAST)
etāny api tu karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā phalāni ca |
kartavyānīti me pārtha niścitaṁ matam uttamam ||
शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
एतानि अपि तु कर्माणिetāni api tu karmāṇiकिन्तु इन (एतानि) भी कर्मों (कर्माणि) को।
सङ्गम् त्यक्त्वाsaṅgam tyaktvāआसक्ति त्यागकर।
फलानि चphalāni caऔर [फल की कामना] को।
कर्तव्यानिkartavyāniकरना चाहिए।
इति मे पार्थiti me pārthaऐसा मेरा (मे), हे पार्थ।
निश्चितम्niścitamनिश्चित, दृढ़।
मतम् उत्तमम्matam uttamamऔर सर्वोत्तम (उत्तमम्) मत (मतम्)।
अनुवाद
“किन्तु इन पवित्र करने वाले कर्मों को भी समस्त आसक्ति और फल की कामना त्यागकर करना चाहिए। हे पार्थ, यही मेरा निश्चित और सर्वोत्तम मत है।”
संस्करण
52dc229e5e95 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
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