भगवद्गीता · 18.68-69
॥
देवनागरी
य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥
लिप्यंतरण (IAST)
ya idaṁ paramaṁ guhyaṁ mad-bhakteṣv abhidhāsyati |
bhaktiṁ mayi parāṁ kṛtvā mām evaiṣyaty asaṁśayaḥ ||
अनुवाद
“जो कोई, मेरे प्रति परा भक्ति विकसित करके, इस परम गुह्य रहस्य को मेरे भक्तों को बताता है, वह निःसन्देह मुझे ही प्राप्त होता है। (68) इस संसार में मनुष्यों के मध्य उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला कोई नहीं है, और न ही कोई मुझे उससे अधिक प्रिय है — न कोई है और न कभी होगा। (69)”
संस्करण
1856c783b0bd · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
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