भगवद्गीता
मोक्ष-संन्यास-योग (त्याग द्वारा मोक्ष का योग)18.23
604 / 655
भगवद्गीता · 18.23
देवनागरी

नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम् ।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥

लिप्यंतरण (IAST)

niyataṁ saṅga-rahitam arāga-dveṣataḥ kṛtam |
a-phala-prepsunā karma yat tat sāttvikam ucyate ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
नियतम्niyatamनियत, धर्म के अनुरूप।
सङ्गरहितम्saṅga-rahitamआसक्ति से रहित।
अरागद्वेषतःa-rāga-dveṣataḥराग (राग) और द्वेष (द्वेषतः) के बिना (अ-)।
कृतम्kṛtamकिया गया।
अफलप्रेप्सुनाa-phala-prepsunāफल (फल) की कामना न करने वाले (अ-प्रेप्सुना) द्वारा।
कर्म यत् तत्karma yat tatवह कर्म, जो।
सात्त्विकम्sāttvikamसात्त्विक।
उच्यतेucyateकहलाता है।
अनुवाद

“जो कर्म धर्म के अनुरूप है, जो आसक्ति रहित होकर, राग-द्वेष के बिना और फल की कामना किए बिना किया जाता है, वह सात्त्विक कर्म कहलाता है।”

संस्करण

4a335de08f82 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से