भगवद्गीता · 18.46
॥
देवनागरी
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥
लिप्यंतरण (IAST)
yataḥ pravṛttir bhūtānāṁ yena sarvam idaṁ tatam |
svakarmaṇā tam abhyarcya siddhiṁ vindati mānavaḥ ||
शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
यतःyataḥजिससे।
प्रवृत्तिःpravṛttiḥप्रवृत्ति होती है, उद्भव होता है।
भूतानाम्bhūtānām[समस्त] प्राणियों की।
येनyenaजिससे।
सर्वम् इदम्sarvam idamयह सारा [जगत]।
ततम्tatamव्याप्त है।
स्वकर्मणाsvakarmaṇāअपने कर्म से।
तम्tamउसकी।
अभ्यर्च्यabhyarcyaआराधना करके।
सिद्धिम्siddhimसिद्धि को।
विन्दतिvindatiप्राप्त करता है।
मानवःmānavaḥमनुष्य।
अनुवाद
“जो समस्त प्राणियों का उद्गम है और जिससे यह सारा जगत व्याप्त है, उसकी अपने नियत कर्म से आराधना करके मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है।”
संस्करण
759590de67b3 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
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