बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥
brahma-bhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati |
samaḥ sarveṣu bhūteṣu mad-bhaktiṁ labhate parām ||
“जिसने ब्रह्म-अवस्था प्राप्त कर ली है, वह पूर्ण शान्ति प्राप्त करता है। वह न शोक करता है और न ही उसकी कोई भौतिक कामना रहती है। वह समस्त प्राणियों के प्रति समान भाव रखता है और इस अवस्था में मेरी परा भक्ति (भक्ति) प्राप्त करता है।”
a45ce67f2747 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
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