भगवद्गीता
मोक्ष-संन्यास-योग (त्याग द्वारा मोक्ष का योग)18.51-54
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भगवद्गीता · 18.51-54
देवनागरी

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।
शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः ।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम् ।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥

लिप्यंतरण (IAST)

brahma-bhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati |
samaḥ sarveṣu bhūteṣu mad-bhaktiṁ labhate parām ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
ब्रह्मभूतःbrahma-bhūtaḥजिसने ब्रह्म-अवस्था प्राप्त कर ली है।
प्रसन्नात्माprasanna-ātmāजिसकी आत्मा (आत्मा) पूर्णतया प्रसन्न (प्रसन्न) है।
न शोचतिna śocatiवह शोक नहीं करता।
न काङ्क्षतिna kāṅkṣatiऔर [भौतिक] कामना नहीं करता।
समः सर्वेषु भूतेषुsamaḥ sarveṣu bhūteṣuसमस्त प्राणियों के प्रति समान भाव रखने वाला।
मद्भक्तिम्mad-bhaktimमेरी भक्ति।
लभतेlabhateवह प्राप्त करता है।
पराम्parāmपरा, सर्वोच्च।
अनुवाद

“जिसने ब्रह्म-अवस्था प्राप्त कर ली है, वह पूर्ण शान्ति प्राप्त करता है। वह न शोक करता है और न ही उसकी कोई भौतिक कामना रहती है। वह समस्त प्राणियों के प्रति समान भाव रखता है और इस अवस्था में मेरी परा भक्ति (भक्ति) प्राप्त करता है।”

संस्करण

a45ce67f2747 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

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