भगवद्गीता · 18.63
॥
देवनागरी
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥
लिप्यंतरण (IAST)
iti te jñānam ākhyātaṁ guhyād guhyataraṁ mayā |
vimṛśyaitad aśeṣeṇa yathecchasi tathā kuru ||
शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
इतिitiइस प्रकार।
ते ज्ञानम्te jñānamतुम्हें (ते) ज्ञान (ज्ञानम्)।
आख्यातम्ākhyātamबताया गया।
गुह्यात् गुह्यतरम्guhyāt guhyataramगुह्य (गुह्यात्) से भी गुह्यतर (गुह्यतरम्)।
मयाmayāमेरे द्वारा।
विमृश्य एतत्vimṛśya etatइसे (एतत्) विचार (विमृश्य) करके।
अशेषेणaśeṣeṇaपूर्ण रूप से।
यथा इच्छसिyathā icchasiजैसा (यथा) चाहो (इच्छसि)।
तथा कुरुtathā kuruवैसा ही करो।
अनुवाद
“इस प्रकार, मैंने तुम्हें वह ज्ञान बताया जो गुह्य से भी गुह्यतर है। इसे भली-भाँति विचार करके, फिर जैसा चाहो वैसा करो।”
संस्करण
c219d2df14dd · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZHश्लोक बदलें इन कुंजियों से