भगवद्गीता
विश्व-रूप-दर्शन-योग (विश्वरूप के दर्शन का योग)11.12
406 / 655
भगवद्गीता · 11.12
देवनागरी

दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता ।
यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः ॥

लिप्यंतरण (IAST)

divi sūrya-sahasrasya bhaved yugapad utthitā |
yadi bhāḥ sadṛśī sā syād bhāsas tasya mahātmanaḥ ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
दिविdiviआकाश में।
सूर्यसहस्रस्यsūrya-sahasrasyaसहस्रों (सहस्र) सूर्यों (सूर्य) का।
भवेत्bhavetयदि उदित हो जाए।
युगपत्yugapatएक साथ।
उत्थिताutthitāउदित हुआ।
यदिyadiयदि।
भाःbhāḥप्रकाश।
सदृशीsadṛśīसमान।
सा स्यात्sā syātवह होता।
भासः तस्यbhāsaḥ tasyaउस (तस्य) के तेज (भास) के।
महात्मनःmahātmanaḥउस महान् [रूप] के।
अनुवाद

“यदि आकाश में एक साथ सहस्रों सूर्य उदित हो जाएँ, तो सम्भवतः उनका प्रकाश उस महान् रूप के तेज के समान होता।”

संस्करण

ea839333c532 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से