भगवद्गीता · 11.28-29
॥
देवनागरी
यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः
समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति ।
तथा तवामी नरलोकवीरा
विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ॥
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा
विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः ।
तथैव नाशाय विशन्ति लोका-
स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः ॥
लिप्यंतरण (IAST)
yathā nadīnāṁ bahavo 'mbu-vegāḥ
samudram evābhimukhā dravanti |
tathā tavāmī nara-loka-vīrā
viśanti vaktrāṇy abhivijvalanti ||
शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
यथा नदीनाम्yathā nadīnāmजैसे नदियों के।
बहवः अम्बुवेगाःbahavaḥ ambu-vegāḥअनेक (बहवः) जल (अम्बु) के प्रवाह (वेग)।
समुद्रम् एवsamudram evaसमुद्र की ओर ही।
अभिमुखाःabhimukhāḥउन्मुख होकर।
द्रवन्तिdravantiवे बहते हैं।
तथा तव अमीtathā tava amīवैसे ही आपके ये।
नरलोकवीराःnara-loka-vīrāḥमनुष्यलोक (नर-लोक) के वीर (वीर)।
विशन्तिviśantiवे प्रवेश करते हैं।
वक्त्राणिvaktrāṇiमुखों में।
अभिविज्वलन्तिabhivijvalantiप्रज्वलित।
यथाyathāजैसे।
प्रदीप्तम् ज्वलनम्pradīptam jvalanamप्रज्वलित (प्रदीप्तम्) अग्नि (ज्वलनम्) में।
पतङ्गाःpataṅgāḥपतंगे।
विशन्ति नाशायviśanti nāśāyaवे विनाश (नाशाय) के लिए प्रवेश करते हैं (विशन्ति)।
समृद्धवेगाःsamṛddha-vegāḥमहान् वेग से।
तथा एवtathā evaठीक वैसे ही।
नाशायnāśāyaविनाश के लिए।
विशन्ति लोकाःviśanti lokāḥये लोग प्रवेश करते हैं।
तव अपिtava apiआपके भी।
वक्त्राणिvaktrāṇiमुखों में।
समृद्धवेगाःsamṛddha-vegāḥमहान् वेग से।
अनुवाद
“जैसे नदियों के अनेक जलप्रवाह वेग से समुद्र की ओर बहते चले जाते हैं, वैसे ही ये मनुष्यलोक के वीर आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। (28) जैसे पतंगे अपने विनाश के लिए महान् वेग से प्रज्वलित अग्नि में कूद पड़ते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने विनाश के लिए महान् वेग से आपके मुखों में दौड़े जा रहे हैं। (29)”
संस्करण
05b3ee90d250 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
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