भगवद्गीता
विश्व-रूप-दर्शन-योग (विश्वरूप के दर्शन का योग)11.31
423 / 655
भगवद्गीता · 11.31
देवनागरी

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो
नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद ।
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं
न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ॥

लिप्यंतरण (IAST)

ākhyāhi me ko bhavān ugra-rūpo
namo 'stu te deva-vara prasīda |
vijñātum icchāmi bhavantam ādyaṁ
na hi prajānāmi tava pravṛttim ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
आख्याहि मेākhyāhi meमुझे बताइए, मुझ पर प्रकट कीजिए।
कः भवान्kaḥ bhavānआप कौन हैं?
उग्ररूपःugra-rūpaḥहे उग्र रूप वाले!
नमः अस्तु तेnamaḥ astu teआपको नमस्कार हो।
देववरdeva-varaहे देववर!
प्रसीदprasīdaप्रसन्न होइए!
विज्ञातुम् इच्छामिvijñātum icchāmiमैं जानना (विज्ञातुम्) चाहता हूँ (इच्छामि)।
भवन्तम् आद्यम्bhavantam ādyamआपको, आदिपुरुष को।
न हि प्रजानामिna hi prajānāmiक्योंकि मैं नहीं समझ पाता।
तव प्रवृत्तिम्tava pravṛttimआपके प्रयोजन को, आपकी प्रवृत्ति को।
अनुवाद

“मुझे बताइए, इस उग्र रूप में प्रकट होने वाले आप कौन हैं? आपको नमस्कार, हे देववर, प्रसन्न होइए! मैं आपको, आदिपुरुष को, जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपके प्रयोजन को बिल्कुल नहीं समझ पा रहा हूँ।”

संस्करण

eb0ac0ae61b8 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से