भगवद्गीता
विश्व-रूप-दर्शन-योग (विश्वरूप के दर्शन का योग)11.15
409 / 655
भगवद्गीता · 11.15
देवनागरी

अर्जुन उवाच ।
पश्यामि देवांस्तव देव देहे
सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् ।
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-
मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ॥

लिप्यंतरण (IAST)

arjuna uvāca |
paśyāmi devāṁs tava deva dehe
sarvāṁs tathā bhūta-viśeṣa-saṅghān |
brahmāṇam īśaṁ kamalāsana-stham
ṛṣīṁś ca sarvān uragāṁś ca divyān ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
अर्जुनः उवाचarjunaḥ uvācaअर्जुन ने कहा।
पश्यामिpaśyāmiमैं देखता हूँ।
देवान्devānसमस्त देवताओं को।
तवtavaआपके।
देवdevaहे प्रभु!
देहेdeheशरीर में।
सर्वान् तथाsarvān tathāतथा समस्त।
भूतविशेषसङ्घान्bhūta-viśeṣa-saṅghānविविध (विशेष) प्राणियों (भूत) के समूहों (सङ्घ) को।
ब्रह्माणम्brahmāṇamब्रह्माजी को।
ईशम्īśamशिवजी को।
कमलासनस्थम्kamala-āsana-sthamकमल (कमल) आसन (आसन) पर विराजमान (स्थम्)।
ऋषीन् च सर्वान्ṛṣīn ca sarvānऔर समस्त ऋषियों को।
उरगान् च दिव्यान्uragān ca divyānऔर दिव्य नागों को।
अनुवाद

अर्जुन ने कहा: “हे मेरे प्रभु, आपके शरीर में मैं समस्त देवताओं तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के प्राणियों के समूहों को देखता हूँ! मैं कमलासन पर विराजमान ब्रह्माजी को, शिवजी को, समस्त महर्षियों को तथा दिव्य नागों को देखता हूँ।”

संस्करण

3a9513c4bf35 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से