भगवद्गीता
ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग (दिव्य ज्ञान, कर्म और संन्यास का योग)4.21
177 / 655
भगवद्गीता · 4.21
देवनागरी

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥

लिप्यंतरण (IAST)

nirāśīr yata-cittātmā tyakta-sarva-parigrahaḥ |
śārīraṁ kevalaṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣam ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
निराशीःnir-āśīḥफलों की कामना से रहित, निष्काम।
यतचित्तात्माyata-citta-ātmāवह, जिसका मन (चित्त) और बुद्धि (आत्मा) पूर्णतः वश में हैं।
त्यक्तसर्वपरिग्रहःtyakta-sarva-parigrahaḥवह, जिसने समस्त स्वामित्व-भाव (परिग्रह) का त्याग कर दिया है।
शारीरम्śārīramशारीरिक, शरीर से सम्बन्धित।
केवलम्kevalamकेवल, मात्र।
कर्मkarmaकर्म।
कुर्वन्kurvanकरते हुए।
न आप्नोतिna āpnotiवह प्राप्त नहीं करता, वह अपने ऊपर नहीं लेता।
किल्बिषम्kilbiṣamपाप को, पाप के परिणामों को।
अनुवाद

“जो फलों की कामना से रहित है, जिसका मन और बुद्धि पूर्णतः वश में हैं, जिसने समस्त स्वामित्व-भाव का त्याग कर दिया है — ऐसा मनुष्य केवल शरीर-निर्वाह के लिए कर्म करता हुआ पाप का भागी नहीं होता।”

संस्करण

57227bb547cf · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से