भगवद्गीता
ज्ञान-कर्म-संन्यास-योग (दिव्य ज्ञान, कर्म और संन्यास का योग)4.41
197 / 655
भगवद्गीता · 4.41
देवनागरी

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥

लिप्यंतरण (IAST)

yogasaṁnyastakarmāṇaṁ jñānasañchinnasaṁśayam |
ātmavantaṁ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
योगसंन्यस्तकर्माणम्yoga-saṁnyasta-karmāṇamवह, जिसने योग के द्वारा कर्मों के फल (कर्म) का परित्याग (संन्यास) कर दिया है।
ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम्jñāna-sañchinna-saṁśayamवह, जिसके सन्देह (संशय) ज्ञान से पूर्णतः छिन्न (संछिन्न) हो गए हैं।
आत्मवन्तम्ātmavantamवह, जो अपने वास्तविक ‘आत्म’ (आत्मा) में स्थित है।
naनहीं।
कर्माणिkarmāṇiकर्म।
निबध्नन्तिnibadhnantiबाँधते हैं।
धनञ्जयdhanañjayaहे धनञ्जय!
अनुवाद

“हे धनञ्जय, जिसने योग के द्वारा अपने कर्मों के फलों का परित्याग कर दिया है, जिसके सन्देह दिव्य ज्ञान से पूर्णतः छिन्न हो गए हैं, और जो अपने वास्तविक ‘आत्म’ में स्थित है — ऐसे मनुष्य को कर्म नहीं बाँधते।”

संस्करण

9e3845449c29 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से