भगवद्गीता · 4.31
॥
देवनागरी
यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।
नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥
लिप्यंतरण (IAST)
yajñaśiṣṭāmṛtabhujo yānti brahma sanātanam |
nāyaṁ loko 'sty ayajñasya kuto 'nyaḥ kurusattama ||
शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
यज्ञशिष्टामृतभुजःyajña-śiṣṭa-amṛta-bhujaḥवे, जो यज्ञ के अवशेष (शिष्ट) रूपी अमृत (अमृत) का पान (भोग) करते हैं।
यान्तिyāntiवे जाते हैं, वे प्राप्त करते हैं।
ब्रह्मbrahmaब्रह्म को।
सनातनम्sanātanamसनातन, नित्य।
न अयम् लोकःna ayam lokaḥयह लोक नहीं।
अस्तिastiविद्यमान है, नियत है।
अयज्ञस्यayajñasyaउसके लिए, जो यज्ञ नहीं करता।
कुतःkutaḥकैसे, कहाँ से।
अन्यःanyaḥदूसरा [लोक]?
कुरुसत्तमkuru-sattamaहे कुरुश्रेष्ठ! (कुरुओं में श्रेष्ठ)।
अनुवाद
“जो यज्ञ के पश्चात् बचे अमृत का पान करते हैं, वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ, जो यज्ञ नहीं करता, उसके लिए इस लोक में भी सुख नहीं है — फिर परलोक की तो बात ही क्या?”
संस्करण
91fade416ff4 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
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