भगवद्गीता
आत्म-संयम-योग (आत्म-नियंत्रण का योग)6.20-22
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भगवद्गीता · 6.20-22
देवनागरी

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया ।
यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥
यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः ।
यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते ॥

लिप्यंतरण (IAST)

yatroparamate cittaṁ niruddhaṁ yoga-sevayā |
yatra caivātmanātmānaṁ paśyann ātmani tuṣyati ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
यत्र उपरमतेyatra uparamate[वह अवस्था] जिसमें [अपनी भौतिक क्रिया] विराम पा जाती है।
चित्तम्cittamचित्त, मन।
निरुद्धम्niruddhamपूर्णतया रुका हुआ, वश में किया हुआ।
योगसेवयाyoga-sevayāयोग की सेवा (सेवा), अभ्यास से।
यत्र च एवyatra ca evaऔर जिसमें भी।
आत्मनाātmanāशुद्ध मन (या आत्मा) के द्वारा।
आत्मानम्ātmānamआत्मा (आत्मा) को।
पश्यन्paśyanदेखते हुए।
आत्मनिātmaniअपनी आत्मा में।
तुष्यतिtuṣyatiवह संतोष पाता है।
सुखम् आत्यन्तिकम्sukham ātyantikamपरम (आत्यन्तिक) सुख (सुख)।
यत् तत्yat tatजो।
बुद्धिग्राह्यम्buddhi-grāhyamबुद्धि (बुद्धि) से ग्राह्य (ग्राह्य)।
अतीन्द्रियम्atīndriyamइन्द्रियों से परे।
वेत्ति यत्रvetti yatra[वह अवस्था] जिसमें वह अनुभव करता है।
न च एव अयम्na ca eva ayamऔर सचमुच यह नहीं।
स्थितःsthitaḥस्थित रहकर [उसमें]।
चलतिcalatiवह विचलित होता है।
तत्त्वतःtattvataḥसत्य से।
यम् लब्ध्वाyam labdhvāजिसे पाकर।
च अपरम् लाभम्ca aparam lābhamअन्य लाभ।
मन्यतेmanyateवह मानता है।
न अधिकम् ततःna adhikam tataḥइससे बड़ा।
यस्मिन् स्थितःyasmin sthitaḥजिसमें स्थित रहकर।
न दुःखेनna duḥkhenaदुःख से, कष्ट से।
गुरुणा अपिguruṇā apiसबसे बड़े से भी।
विचाल्यतेvicālyateवह विचलित होता है, उसे डिगाया जा सकता है।
अनुवाद

“योग के अभ्यास से प्राप्त उस अवस्था में, जब चित्त भौतिक क्रिया से पूर्णतया विरत हो जाता है, मनुष्य अपनी शुद्ध बुद्धि के द्वारा अपने सच्चे “स्व” [आत्मा] को देखता है और उसी में पूर्ण संतोष पाता है। (२०) उस आनन्दमय अवस्था में वह अनन्त दिव्य सुख का अनुभव करता है, जो “स्थिर” बुद्धि से ग्राह्य है, किन्तु भौतिक इन्द्रियों से परे है। उसमें स्थित होकर वह फिर कभी सत्य से विचलित नहीं होता। (२१) इसे पाकर वह समझ जाता है कि इससे बड़ा कोई लाभ नहीं है। और उसमें स्थित होकर वह सबसे बड़ी विपत्तियों के सामने भी अविचल रहता है। (२२)”

संस्करण

383e8150ff80 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

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