भगवद्गीता
आत्म-संयम-योग (आत्म-नियंत्रण का योग)6.35
254 / 655
भगवद्गीता · 6.35
देवनागरी

श्रीभगवानुवाच ।
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम् ।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

लिप्यंतरण (IAST)

śrī-bhagavān uvāca |
asaṁśayaṁ mahābāho mano durnigrahaṁ calam |
abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa ca gṛhyate ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
श्रीभगवान् उवाचśrī-bhagavān uvācaश्रीभगवान् ने कहा।
असंशयम्asaṁśayamनिःसन्देह, बिना शक के।
महाबाहोmahā-bāhoहे महाबाहु!
मनःmanaḥमन।
दुर्निग्रहम्durnigrahamकठिनता से वश में होने वाला।
चलम्calamचंचल।
अभ्यासेन तुabhyāsena tuकिन्तु अभ्यास के द्वारा।
कौन्तेयkaunteyaहे कुन्तीपुत्र!
वैराग्येण चvairāgyeṇa caऔर वैराग्य के द्वारा।
गृह्यतेgṛhyateवह वश में होता है, इसे नियन्त्रित किया जा सकता है।
अनुवाद

श्रीभगवान् ने कहा: “हे महाबाहु कुन्तीपुत्र, निःसन्देह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। किन्तु अभ्यास और वैराग्य के द्वारा इसे वश में किया जा सकता है।”

संस्करण

7cbd70005e4f · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से