भगवद्गीता
राज-विद्या-राज-गुह्य-योग (राजविद्या और राजरहस्य का योग)9.6
328 / 655
भगवद्गीता · 9.6
देवनागरी

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय ॥

लिप्यंतरण (IAST)

yathākāśa-sthito nityaṁ vāyuḥ sarvatra-go mahān |
tathā sarvāṇi bhūtāni mat-sthānīty upadhāraya ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
यथाyathāजिस प्रकार।
आकाशस्थितःākāśa-sthitaḥआकाश (आकाश) में स्थित (स्थित)।
नित्यम्nityamसदा।
वायुःvāyuḥवायु।
सर्वत्रगःsarvatra-gaḥसर्वत्र गमन करने वाली।
महान्mahānमहान।
तथाtathāउसी प्रकार।
सर्वाणि भूतानिsarvāṇi bhūtāniसमस्त प्राणी।
मत्स्थानिmat-sthāniमुझमें स्थित हैं।
इति उपधारयiti upadhārayaइस प्रकार समझ लो।
अनुवाद

“जिस प्रकार सर्वत्र बहने वाली महान वायु सदा आकाश में स्थित रहती है [उससे मिले बिना], उसी प्रकार समस्त सृजित प्राणी मुझमें स्थित रहते हैं। इसे समझ लो।”

संस्करण

35e1db2d6f11 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से