त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते ॥
traividyā māṁ somapāḥ pūta-pāpā
yajñair iṣṭvā svargatiṁ prārthayante |
te puṇyam āsādya surendra-lokam
aśnanti divyān divi deva-bhogān ||
“जो तीनों वेदों का अध्ययन करते हैं, सोमरस पीते हैं और पापों से शुद्ध होते हैं, वे यज्ञों के द्वारा मेरी उपासना करते हैं, स्वर्ग के मार्ग की प्रार्थना करते हुए। इन्द्र के पुण्यलोक को प्राप्त करके वे स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोगों का उपभोग करते हैं। (20) किन्तु उस विशाल स्वर्गलोक का भोग कर लेने और अपने पुण्य के भण्डार के समाप्त हो जाने पर वे पुनः मर्त्यलोक में लौट आते हैं। इस प्रकार जो इन्द्रिय-भोग की कामना से तीनों वेदों के कर्मकाण्ड का अनुसरण करते हैं, वे केवल जन्म-मृत्यु के अन्तहीन चक्र को ही प्राप्त करते हैं। (21)”
fdf6834031e4 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
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