भगवद्गीता
राज-विद्या-राज-गुह्य-योग (राजविद्या और राजरहस्य का योग)9.20-21
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भगवद्गीता · 9.20-21
देवनागरी

त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा
यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-
मश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् ॥
ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
गतागतं कामकामा लभन्ते ॥

लिप्यंतरण (IAST)

traividyā māṁ somapāḥ pūta-pāpā
yajñair iṣṭvā svargatiṁ prārthayante |
te puṇyam āsādya surendra-lokam
aśnanti divyān divi deva-bhogān ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
त्रैविद्याःtraividyāḥतीनों वेदों के ज्ञाता।
माम्māmमेरी [परोक्ष रूप से]।
सोमपाःsoma-pāḥसोमरस पीने वाले।
पूतपापाःpūta-pāpāḥपापों से शुद्ध हुए।
यज्ञैः इष्ट्वाyajñaiḥ iṣṭvāयज्ञों (यज्ञैः) से मेरी उपासना करके (इष्ट्वा)।
स्वर्गतिम्svargatimस्वर्ग के मार्ग (गतिम्) की।
प्रार्थयन्तेprārthayanteवे प्रार्थना करते हैं।
ते पुण्यम् आसाद्यte puṇyam āsādyaवे पुण्य (पुण्यम्) को प्राप्त करके (आसाद्य)।
सुरेन्द्रलोकम्surendra-lokamसुरों के स्वामी इन्द्र के लोक (लोकम्) को।
अश्नन्तिaśnantiवे भोग करते हैं।
दिव्यान् दिविdivyān diviस्वर्ग में (दिवि) दिव्य (दिव्यान्)।
देवभोगान्deva-bhogānदेवताओं के भोगों (भोगान्) को।
ते तम् भुक्त्वाte tam bhuktvāवे उस (तम्) का भोग करके (भुक्त्वा)।
स्वर्गलोकम् विशालम्svarga-lokam viśālamविशाल (विशालम्) स्वर्गलोक को।
क्षीणे पुण्येkṣīṇe puṇyeजब उनका पुण्य (पुण्ये) क्षीण (क्षीणे) हो जाता है।
मर्त्यलोकम्martya-lokamमर्त्यलोक में।
विशन्तिviśantiवे [पुनः] प्रवेश करते हैं।
एवम्evamइस प्रकार।
त्रयीधर्मम्trayī-dharmamतीनों वेदों के धर्म [कर्मकाण्ड] का।
अनुप्रपन्नाःanuprapannāḥजो अनुसरण करते हैं।
गतागतम्gata-āgatamआना (आगतम्) और जाना (गत), आवागमन।
कामकामाःkāma-kāmāḥजो इन्द्रिय-भोगों (काम) की कामना (कामः) करते हैं।
लभन्तेlabhanteवे प्राप्त करते हैं।
अनुवाद

“जो तीनों वेदों का अध्ययन करते हैं, सोमरस पीते हैं और पापों से शुद्ध होते हैं, वे यज्ञों के द्वारा मेरी उपासना करते हैं, स्वर्ग के मार्ग की प्रार्थना करते हुए। इन्द्र के पुण्यलोक को प्राप्त करके वे स्वर्ग में देवताओं के दिव्य भोगों का उपभोग करते हैं। (20) किन्तु उस विशाल स्वर्गलोक का भोग कर लेने और अपने पुण्य के भण्डार के समाप्त हो जाने पर वे पुनः मर्त्यलोक में लौट आते हैं। इस प्रकार जो इन्द्रिय-भोग की कामना से तीनों वेदों के कर्मकाण्ड का अनुसरण करते हैं, वे केवल जन्म-मृत्यु के अन्तहीन चक्र को ही प्राप्त करते हैं। (21)”

संस्करण

fdf6834031e4 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

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