भगवद्गीता
राज-विद्या-राज-गुह्य-योग (राजविद्या और राजरहस्य का योग)9.30
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भगवद्गीता · 9.30
देवनागरी

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥

लिप्यंतरण (IAST)

api cet su-durācāro bhajate mām ananya-bhāk |
sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
अपि चेत्api cetयदि भी।
सुदुराचारःsu-dur-ācāraḥअत्यन्त निन्दनीय कर्म करने वाला, परम पापी।
भजतेbhajateवह सेवा करता है, वह उपासना करता है।
माम्māmमेरी।
अनन्यभाक्ananya-bhākअनन्य रूप से, बिना विचलित हुए।
साधुः एवsādhuḥ evaसाधु (सन्त) ही।
सः मन्तव्यःsaḥ mantavyaḥउसे मानना चाहिए।
सम्यक्samyakउचित रूप से, पूर्णतः।
व्यवसितःvyavasitaḥवह दृढ़संकल्प है, वह सही मार्ग पर है।
हि सःhi saḥक्योंकि वह।
अनुवाद

“यदि कोई अत्यन्त निन्दनीय कर्म भी करे, किन्तु अनन्य भक्ति से मेरी सेवा करे, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि वह सही मार्ग पर स्थित है।”

संस्करण

d758f106c7f6 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

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