गोपालचम्पूः
Uddhava with the Message2.10.41जीव गोस्वामी
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गोपालचम्पूः · 2.10.41
॥
देवनागरी

जानीमः प्रत्येकं गा मनुते स स्वतोऽप्य् अधिकाः ।
निजकरकवलैः पुषितास् तः किं चित्ते समाहरति ॥41॥

लिप्यंतरण (IAST)

jānīmaḥ pratyekaṁ gā manute sa svato’py adhikāḥ |
nija-kara-kavalaiḥ puṣitās taḥ kiṁ citte samāharati ||41||

छन्द अज्ञात

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
जानीमःjānīmaḥзнаем мы:
प्रत्येकंpratyekaṁкаждую
गाgāкорову
मनुतेmanuteсчитает
सsaОн
स्वतोऽप्य्svato’pyсебя самого
अधिकाःadhikāḥдороже;
निज-कर-कवलैःnija-kara-kavalaiḥс руки своей кусками
पुषितास्puṣitāsвскормленных,
तःtaḥих
किंkiṁли
चित्तेcitteв сердце
समाहरतिsamāharatiсобирает?
अनुवाद

Мы знаем: каждую корову Он считает дороже себя. Вспоминает ли Он тех, кого кормил с руки?

संस्करण

2042468f9b45 · प्रकाशित 25 सित॰ 2026, 2:56:52 am UTC

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