भगवद्गीता · 10.6
॥
देवनागरी
महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा ।
मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः ॥
लिप्यंतरण (IAST)
maharṣayaḥ sapta pūrve catvāro manavas tathā |
mad-bhāvā mānasā jātā yeṣāṁ loka imāḥ prajāḥ ||
शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
महर्षयः सप्तmaharṣayaḥ saptaसात महर्षि।
पूर्वेpūrveप्राचीन, जो उनसे पूर्व हुए।
चत्वारःcatvāraḥऔर चार।
मनवः तथाmanavaḥ tathāतथा मनु।
मद्भावाःmat-bhāvāḥजो मेरी प्रकृति वाले हैं, जो मुझमें एकाग्र हैं।
मानसाः जाताःmānasāḥ jātāḥमन (मानसः) से उत्पन्न (जातः)।
येषाम्yeṣāmजिनसे।
लोकेlokeइस लोक में।
इमाः प्रजाःimāḥ prajāḥये समस्त संतानें, समस्त प्राणी।
अनुवाद
“सात महर्षि, और उनसे पूर्व के चार, तथा समस्त मनु [मानवजाति के प्रजापति] मेरे मन से उत्पन्न हुए हैं, क्योंकि वे पूर्णतया मेरे चिन्तन में लीन रहते हैं। और उन्हीं से इन लोकों के समस्त प्राणी उत्पन्न हुए हैं।”
संस्करण
c0ca4ada63f8 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
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