भगवद्गीता
विभूति-योग (दिव्य विभूतियों का योग)10.8
362 / 655
भगवद्गीता · 10.8
देवनागरी

अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते ।
इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः ॥

लिप्यंतरण (IAST)

ahaṁ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṁ pravartate |
iti matvā bhajante māṁ budhā bhāva-samanvitāḥ ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
अहम्ahamमैं।
सर्वस्यsarvasyaसबका।
प्रभवःprabhavaḥउद्गम, स्रोत।
मत्तःmattaḥमुझसे।
सर्वम्sarvamसब कुछ।
प्रवर्ततेpravartateप्रवृत्त होता है, उत्पन्न होता है।
इतिitiइस प्रकार।
मत्वाmatvāजानकर, समझकर।
भजन्तेbhajanteवे प्रेमपूर्वक भजते हैं।
माम्māmमुझे।
बुधाःbudhāḥबुद्धिमान, ज्ञानी।
भावसमन्विताःbhāva-samanvitāḥभाव (भाव) से युक्त (समन्वितः)।
अनुवाद

“मैं सबका उद्गम हूँ; सब कुछ मुझसे ही प्रवृत्त होता है। यह जानकर, भावपूर्ण प्रेम से युक्त बुद्धिमान जन मेरी भक्ति करते हैं।”

संस्करण

3367eb7e4de4 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से