भगवद्गीता
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग-योग (क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद का योग)13.8
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भगवद्गीता · 13.8
देवनागरी

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥

लिप्यंतरण (IAST)

amānitvam adambhitvam ahiṁsā kṣāntir ārjavam |
ācāryopāsanaṁ śaucaṁ sthairyam ātma-vinigrahaḥ ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
अमानित्वम्amānitvamविनम्रता, सम्मान की चाह का अभाव।
अदम्भित्वम्adambhitvamअभिमान और दम्भ का अभाव।
अहिंसाahiṁsāअहिंसा।
क्षान्तिःkṣāntiḥक्षमा, सहनशीलता।
आर्जवम्ārjavamसरलता, ऋजुता।
आचार्योपासनम्ācārya-upāsanamसच्चे आध्यात्मिक गुरु (आचार्य) की सेवा (उपासना)।
शौचम्śaucamशुचिता (बाह्य एवं आन्तरिक)।
स्थैर्यम्sthairyamदृढ़ता, संकल्प।
आत्मविनिग्रहःātma-vinigrahaḥआत्मसंयम, आत्म-नियंत्रण।
अनुवाद

“विनम्रता, दम्भ का अभाव, अहिंसा, क्षमा, सरलता, सच्चे गुरु की सेवा, शुचिता, दृढ़ता और आत्मसंयम...”

संस्करण

34c80534d839 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

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