भगवद्गीता
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग-योग (क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद का योग)13.9
470 / 655
भगवद्गीता · 13.9
देवनागरी

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥

लिप्यंतरण (IAST)

indriyārtheṣu vairāgyam anahaṅkāra eva ca |
janma-mṛtyu-jarā-vyādhi-duḥkha-doṣānudarśanam ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
इन्द्रियार्थेषुindriya-artheṣuइन्द्रिय-विषयों के प्रति।
वैराग्यम्vairāgyamवैराग्य, आसक्ति का अभाव।
अनहङ्कारःan-ahaṅkāraḥअहंकार का अभाव।
एव चeva caतथा।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्janma-mṛtyu-jarā-vyādhi-duḥkha-doṣa-anudarśanamजन्म (जन्म), मृत्यु (मृत्यु), वृद्धावस्था (जरा) और रोग (व्याधि) [के द्वारा लाए गए] दुःख (दुःख) की बुराई (दोष) का निरन्तर (अनु) दर्शन (दर्शन)।
अनुवाद

“इन्द्रिय-विषयों से वैराग्य, अहंकार का अभाव, तथा जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोग जो दुःख लाते हैं, उनकी बुराई का स्पष्ट दर्शन...”

संस्करण

077e1f02a0fc · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से