भगवद्गीता
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ-विभाग-योग (क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद का योग)13.31
490 / 655
भगवद्गीता · 13.31
देवनागरी

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥

लिप्यंतरण (IAST)

yadā bhūta-pṛthag-bhāvam eka-stham anupaśyati |
tata eva ca vistāraṁ brahma sampadyate tadā ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
यदाyadāजब।
भूतपृथग्भावम्bhūta-pṛthak-bhāvamजीवों (भूत) का पृथक् (पृथक्) अस्तित्व (भाव)।
एकस्थम्eka-sthamएक (एक) में स्थित।
अनुपश्यतिanupaśyatiवह देखता है, वह अनुभव करता है।
ततः एव चtataḥ eva caऔर उसी से।
विस्तारम्vistāramविस्तार, एमानेशन।
ब्रह्म सम्पद्यतेbrahma sampadyateवह ब्रह्म को प्राप्त होता है।
तदाtadāतब।
अनुवाद

“जब मनुष्य यह देखता है कि समस्त जीवों की विविधता एक [पुरुष] में ही स्थित है, और वे सब उसी से विस्तार पाते हैं — तब वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।”

संस्करण

2cad14981204 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से