भगवद्गीता · 13.35
॥
देवनागरी
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम् ॥
लिप्यंतरण (IAST)
kṣetra-kṣetrajñayor evam antaraṁ jñāna-cakṣuṣā |
bhūta-prakṛti-mokṣaṁ ca ye vidur yānti te param ||
शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोःkṣetra-kṣetrajñayoḥक्षेत्र (क्षेत्र) और क्षेत्रज्ञ (क्षेत्र-ज्ञ) के बीच।
एवम्evamइस प्रकार।
अन्तरम्antaramभेद।
ज्ञानचक्षुषाjñāna-cakṣuṣāज्ञान (ज्ञान) के नेत्र (चक्षु) से।
भूतप्रकृतिमोक्षम् चbhūta-prakṛti-mokṣam caऔर (च) भौतिक प्रकृति (भूत-प्रकृति) से मुक्ति (मोक्ष) का मार्ग।
ये विदुःye viduḥजो जानते हैं।
यान्ति ते परम्yānti te paramवे परम [लक्ष्य] (परम) को प्राप्त होते (यान्ति) हैं।
अनुवाद
“जो ज्ञान के नेत्र से क्षेत्र [शरीर] और क्षेत्रज्ञ [आत्मा] के इस भेद को देखते हैं, तथा भौतिक प्रकृति के बन्धन से मुक्ति के मार्ग को भी जानते हैं — वे परम लक्ष्य को प्राप्त होते हैं।”
संस्करण
aad5fe5fe0ad · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
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