भगवद्गीता · 13.21
॥
देवनागरी
कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ॥
लिप्यंतरण (IAST)
kārya-kāraṇa-kartṛtve hetuḥ prakṛtir ucyate |
puruṣaḥ sukha-duḥkhānāṁ bhoktṛtve hetur ucyate ||
शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
कार्यकारणकर्तृत्वेkārya-kāraṇa-kartṛtveशरीर (कार्य) और इन्द्रियों (कारण) की क्रिया (कर्तृत्व) में।
हेतुःhetuḥकारण।
प्रकृतिःprakṛtiḥभौतिक प्रकृति (प्रकृति)।
उच्यतेucyateकहलाती है।
पुरुषःpuruṣaḥजीव (पुरुष, आत्मा)।
सुखदुःखानाम्sukha-duḥkhānāmसुख (सुख) और दुःख (दुःख) का।
भोक्तृत्वेbhoktṛtveअनुभव में, भोग में।
हेतुःhetuḥकारण।
उच्यतेucyateकहलाता है।
अनुवाद
“कहा जाता है कि भौतिक प्रकृति (प्रकृति) समस्त भौतिक कर्म और उसके परिणामों का कारण है, जबकि जीव (पुरुष) इस जगत् में सुख और दुःख के अनुभव का कारण है।”
संस्करण
cbff0644eb94 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
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