भगवद्गीता · 13.16
॥
देवनागरी
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च ।
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत् ॥
लिप्यंतरण (IAST)
bahir antaś ca bhūtānām acaraṁ caram eva ca |
sūkṣmatvāt tad avijñeyaṁ dūra-sthaṁ cāntike ca tat ||
शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
बहिः अन्तः चbahiḥ antaḥ caबाहर (बहिः) भी और भीतर (अन्तः) भी।
भूतानाम्bhūtānāmसमस्त जीवों के।
अचरम् चरम् एव चacaram caram eva caअचर (अचर) भी और चर (चर) भी।
सूक्ष्मत्वात्sūkṣmatvātअपनी सूक्ष्म प्रकृति के कारण।
तत् अविज्ञेयम्tat avijñeyamवह (तत्) अगोचर (अविज्ञेय) है।
दूरस्थम् चdūra-stham caऔर दूर (दूर) स्थित (स्थ)।
अन्तिके च तत्antike ca tatऔर वही निकट (अन्तिक) भी।
अनुवाद
“वह समस्त जीवों के बाहर भी है और भीतर भी; वह चर भी है और अचर भी। अपनी सूक्ष्म प्रकृति के कारण वह [भौतिक इन्द्रियों के लिए] अगोचर है। वह अत्यन्त दूर है, और वही अत्यन्त निकट भी है।”
संस्करण
472f239e2be6 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
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