पुस्तकालयचैतन्यचन्द्रामृत
vaishnava
चैतन्यचन्द्रामृत
«चैतन्यचन्द्रामृत» — प्रबोधानन्द सरस्वती के १४४ श्लोक, जो श्रीचैतन्य से मिलने के कुछ ही समय बाद रचे गए। इसमें कथा नहीं, एक ही विस्मय है — बार-बार कहा गया: भगवन्नाम उन्हीं के मुख से फूट पड़ता है जिन्होंने कुछ नहीं किया, वज्र-सा हृदय मक्खन हो जाता है, और शास्त्रज्ञ तथा तपस्वी खाली रह जाते हैं।
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