भगवद्गीता
कर्म-योग (कर्म का योग)3.30
143 / 655
भगवद्गीता · 3.30
देवनागरी

मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः ॥

लिप्यंतरण (IAST)

mayi sarvāṇi karmāṇi saṁnyasyādhyātmacetasā |
nirāśīr nirmamo bhūtvā yudhyasva vigatajvaraḥ ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
मयिmayiमुझे, मुझमें।
सर्वाणिsarvāṇiसमस्त।
कर्माणिkarmāṇiकर्म।
संन्यस्यsaṁnyasyaअर्पित करके, समर्पित करके, [फलों को] मेरे पक्ष में त्यागकर।
अध्यात्मचेतसाadhyātma-cetasāपरमात्मा (अध्यात्म) में केन्द्रित चेतना (चेतना) से।
निराशीःnir-āśīḥभौतिक लाभ की लालसा के बिना, [फलों की] भौतिक इच्छा के बिना।
निर्ममःnirmamaḥ‘मेरे’ के भाव के बिना, ममता के बिना।
भूत्वाbhūtvāहोकर, बनकर।
युध्यस्वyudhyasvaयुद्ध करो!
विगतज्वरःvigata-jvaraḥज्वर (ज्वर) से, उदासीनता और शोक से मुक्त होकर।
अनुवाद

“अपने समस्त कर्मों को मुझे अर्पित करके, परमात्मा में केन्द्रित चेतना से, भौतिक लाभ की लालसा और ‘मेरे’ के भाव से मुक्त होकर, इस [शोक की] ज्वर से मुक्त होकर युद्ध करो!”

संस्करण

5535a5288f19 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से