भगवद्गीता
कर्म-योग (कर्म का योग)3.37
150 / 655
भगवद्गीता · 3.37
देवनागरी

श्रीभगवानुवाच ।
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥

लिप्यंतरण (IAST)

śrī-bhagavān uvāca |
kāma eṣa krodha eṣa rajoguṇasamudbhavaḥ |
mahāśano mahāpāpmā viddhy enam iha vairiṇam ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
श्रीभगवान् उवाचśrī-bhagavān uvācaश्री भगवान ने कहा।
कामःkāmaḥवासना, कामना।
एषःeṣaḥयह।
क्रोधःkrodhaḥक्रोध।
एषःeṣaḥयह।
रजोगुणसमुद्भवःrajo-guṇa-samudbhavaḥरजोगुण (रजो-गुण) से उत्पन्न (समुद्भव)।
महाशनःmahā-aśanaḥसर्वभक्षी (शाब्दिक अर्थ ‘महाभोगी’)।
महापाप्माmahā-pāpmāमहापाप, पाप का स्वरूप।
विद्धिviddhiजानो।
एनम्enamइसे।
इहihaयहाँ, इस संसार में।
वैरिणम्vairiṇamशत्रु।
अनुवाद

श्री भगवान ने कहा: “यह वह वासना (काम) है, जो [अतृप्त रहने पर] क्रोध (क्रोध) में बदल जाती है। यह रजोगुण से उत्पन्न होती है। इसे ही सर्वभक्षी, महापापी और इस संसार में अपना प्रमुख शत्रु जानो।”

संस्करण

b511a3885a0e · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से