भगवद्गीता
अर्जुन-विषाद-योग (अर्जुन के विषाद का योग)1.11
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भगवद्गीता · 1.11
देवनागरी

अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः ।
भीष्ममेवाभिरक्षन्तु भवन्तः सर्व एव हि ॥

लिप्यंतरण (IAST)

ayaneṣu ca sarveṣu yathābhāgam avasthitāḥ |
bhīṣmam evābhirakṣantu bhavantaḥ sarva eva hi ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
अयनेषुayaneṣuसामरिक स्थानों पर, सभी मोर्चों पर, प्रवेशद्वारों पर।
caऔर।
सर्वेषुsarveṣuसब पर।
यथाभागम्yathā-bhāgamअपने-अपने स्थान के अनुसार, प्रत्येक अपने मोर्चे पर।
अवस्थिताःavasthitāḥस्थित रहते हुए, खड़े रहते हुए।
भीष्मम्bhīṣmamभीष्म की।
एवevaविशेष रूप से, केवल, निश्चय ही।
अभिरक्षन्तुabhirakṣantuरक्षा करें, रक्षा करनी चाहिए, सब ओर से रक्षा करो।
भवन्तःbhavantaḥआप सब (सम्मानपूर्वक, सभी सेनापतियों को सम्बोधन)।
सर्वेsarveसब।
एवevaसचमुच, अवश्य।
हिhiनिश्चय ही, अवश्य।
अनुवाद

“इसलिए, अपने-अपने मोर्चे पर स्थित रहते हुए, आप सब निःसंदेह विशेष रूप से भीष्म की ही रक्षा कीजिए!”

संस्करण

c7a127be81cf · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

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