भगवद्गीता · 1.27
॥
देवनागरी
श्वशुरान्सुहृदश्चैव सेनयोरुभयोरपि ।
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान् ॥
लिप्यंतरण (IAST)
śvaśurān suhṛdaś caiva senayor ubhayor api |
tān samīkṣya sa kaunteyaḥ sarvān bandhūn avasthitān ||
शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
श्वशुरान्śvaśurānश्वसुरों को, ससुराल पक्ष के सम्बन्धियों को।
सुहृदःsuhṛdaḥसुहृदों को, घनिष्ठ मित्रों को।
चcaऔर।
एवevaभी, सचमुच।
सेनयोःsenayoḥसेनाओं में।
उभयोःubhayoḥदोनों में।
अपिapiभी।
तान्tānउन पर।
समीक्ष्यsamīkṣyaदेखकर, दृष्टि डालकर।
सःsaḥवह।
कौन्तेयःkaunteyaḥकुन्ती के पुत्र (अर्जुन)।
सर्वान्sarvānसब पर।
बन्धून्bandhūnबन्धुओं पर, सम्बन्धियों पर।
अवस्थितान्avasthitānखड़े हुओं पर।
अनुवाद
[अर्जुन ने] दोनों सेनाओं की पंक्तियों में खड़े अपने श्वसुरों और सुहृदों को भी [देखा]। इन सब एकत्र हुए बन्धुओं को देखकर वह कुन्तीपुत्र...
संस्करण
b3d2ce86f3d7 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
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