आनन्दवृन्दावनचम्पूः
The festival of the invitation10.60कवि कर्णपूर
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आनन्दवृन्दावनचम्पूः · 10.60
॥
देवनागरी

स आह—“किं भोक्तव्यं मूकवदनेन वदनेन? सहस्रेणैव वदनानां वदनानाञ्चनीयमिदं भोक्तुं व्याख्यातुं च किं शक्यते” ॥60॥

लिप्यंतरण (IAST)

sa āha—“kiṁ bhoktavyaṁ mūkavadanena vadanena? sahasreṇaiva vadanānāṁ vadanānāñcanīyamidaṁ bhoktuṁ vyākhyātuṁ ca kiṁ śakyate” ||60||

अनुवाद

Тот сказал: «Что же, есть немым ртом? Такое можно и съесть, и описать лишь тысячей ртов!»

संस्करण

b100da8af8db · प्रकाशित 28 सित॰ 2026, 11:15:30 pm UTC

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