भगवद्गीता
सांख्य-योग (विश्लेषणात्मक ज्ञान का योग)2.13
58 / 655
भगवद्गीता · 2.13
देवनागरी

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

लिप्यंतरण (IAST)

dehino 'smin yathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā |
tathā dehāntaraprāptir dhīras tatra na muhyati ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
देहििनःdehinaḥदेहधारी [आत्मा] की।
अस्मिन्asminइस।
यथाyathāजैसे, जिस प्रकार।
देहेdeheशरीर में।
कौमारम्kaumāramबाल्यावस्था।
यौवनम्yauvanamयुवावस्था।
जराjarāवृद्धावस्था।
तथाtathāवैसे ही, उसी प्रकार।
देहान्तरप्राप्तिःdeha-antara-prāptiḥदूसरे (अन्तर) शरीर (देह) की प्राप्ति (प्राप्ति), शरीर-परिवर्तन।
धीरःdhīraḥधीर, विवेकी, शान्त पुरुष।
तत्रtatraइसमें, इसके कारण।
न मुह्यतिna muhyatiमोहित नहीं होता, भ्रमित नहीं होता, विचलित नहीं होता।
अनुवाद

“जैसे इस शरीर में देहधारी आत्मा (आत्मा) क्रमशः बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था से गुज़रती है, वैसे ही मृत्यु के पश्चात् वह दूसरा शरीर धारण करती है। धीर पुरुष ऐसे परिवर्तन से मोहित नहीं होता।”

संस्करण

a00b80be8102 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से