भगवद्गीता
सांख्य-योग (विश्लेषणात्मक ज्ञान का योग)2.29
74 / 655
भगवद्गीता · 2.29
देवनागरी

आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन-
माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥

लिप्यंतरण (IAST)

āścaryavat paśyati kaścid enam
āścaryavad vadati tathaiva cānyaḥ |
āścaryavac cainam anyaḥ śṛṇoti
śrutvāpy enaṁ veda na caiva kaścit ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
आश्चर्यवत्āścaryavatआश्चर्य की भाँति, विस्मय से।
पश्यतिpaśyatiदेखता है।
कश्चित्kaścitकोई, कोई विरला।
एनम्enamइसे [आत्मा को]।
आश्चर्यवत्āścaryavatआश्चर्य की भाँति, विस्मय से।
वदतिvadatiकहता है।
तथा एव चtathā eva caऔर वैसे ही।
अन्यःanyaḥदूसरा।
आश्चर्यवत्āścaryavatआश्चर्य की भाँति, विस्मय से।
च एनम्ca enamऔर इसके विषय में।
अन्यःanyaḥदूसरा।
शृणोतिśṛṇotiसुनता है।
श्रुत्वा अपिśrutvā apiसुनकर भी।
एनम्enamइसके विषय में।
वेदvedaजानता है [सचमुच]।
न च एवna ca evaऔर निश्चय ही नहीं।
कश्चित्kaścitकोई, कोई नहीं।
अनुवाद

“कोई आत्मा को आश्चर्य की भाँति देखते हैं, कोई इसके विषय में आश्चर्य की भाँति कहते हैं, और कोई इसके विषय में आश्चर्य की भाँति सुनते हैं। किन्तु सुनकर भी इसे सचमुच शायद ही कोई जान पाता है।”

संस्करण

475adcd855d8 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से