भगवद्गीता · 2.34
॥
देवनागरी
अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् ।
सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥
लिप्यंतरण (IAST)
akīrtiṁ cāpi bhūtāni kathayiṣyanti te 'vyayām |
sambhāvitasya cākīrtir maraṇād atiricyate ||
शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
अकीर्तिम्akīrtimअकीर्ति, अपयश, बदनामी।
च अपिca apiऔर भी।
भूतानिbhūtāniलोग, समस्त प्राणी।
कथयिष्यन्तिkathayiṣyantiचर्चा करेंगे, कहेंगे।
तेteतेरी।
अव्ययाम्avyayāmसदा रहने वाली, अविनाशी, अनन्त।
सम्भावितस्यsambhāvitasyaसम्मानित के लिए, प्रतिष्ठित पुरुष के लिए।
चcaऔर।
अकीर्तिःakīrtiḥअपकीर्ति।
मरणात्maraṇātमृत्यु से।
अतिरिच्यतेatiricyateबढ़कर है, अधिक कष्टकर है।
अनुवाद
“लोग सदा तेरी अपकीर्ति की चर्चा करते रहेंगे। और जो सम्मानित रहा है, उसके लिए अपमान मृत्यु से भी बढ़कर है।”
संस्करण
5a9a60f13863 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC
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