भगवद्गीता
सांख्य-योग (विश्लेषणात्मक ज्ञान का योग)2.68
111 / 655
भगवद्गीता · 2.68
देवनागरी

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः ।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

लिप्यंतरण (IAST)

tasmād yasya mahābāho nigṛhītāni sarvaśaḥ |
indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣṭhitā ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
तस्मात्tasmātइसलिए, अतः।
यस्यyasyaजिसकी।
महाबाहोmahā-bāhoहे महाबाहु!
निगृहीतानिnigṛhītāniपूर्णतः वश में हैं, संयमित हैं, नियन्त्रण में हैं।
सर्वशःsarvaśaḥपूर्णतः, सब ओर से।
इन्द्रियाणिindriyāṇiइन्द्रियाँ।
इन्द्रियार्थेभ्यःindriya-arthebhyaḥइन्द्रियों के विषयों से।
तस्यtasyaउसकी।
प्रज्ञाprajñāबुद्धि, चेतना।
प्रतिष्ठिताpratiṣṭhitāस्थिर हो चुकी है।
अनुवाद

“इसलिए, हे महाबाहु, जिसकी इन्द्रियाँ [उसकी आत्मा के] पूर्ण वश में हैं और अपने विषयों से विरत रहती हैं — ऐसे पुरुष की बुद्धि सचमुच स्थिर हो चुकी है।”

संस्करण

3837d16f6acc · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से