भगवद्गीता
सांख्य-योग (विश्लेषणात्मक ज्ञान का योग)2.19
64 / 655
भगवद्गीता · 2.19
देवनागरी

य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् ।
उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ॥

लिप्यंतरण (IAST)

ya enaṁ vetti hantāraṁ yaś cainaṁ manyate hatam |
ubhau tau na vijānīto nāyaṁ hanti na hanyate ||

शब्दशः अर्थ
संस्कृतIASTअर्थ
यःyaḥजो।
एनम्enamइसे [आत्मा को]।
वेत्तिvettiजानता है, मानता है।
हन्तारम्hantāramमारने वाला।
यः चyaḥ caऔर जो।
एनम्enamइसे [आत्मा को]।
मन्यतेmanyateसोचता है, मानता है।
हतम्hatamमरा हुआ।
उभौ तौubhau tauवे दोनों।
न विजानीतःna vijānītaḥनहीं जानते, नहीं समझते, अज्ञान में हैं।
न अयम्na ayamन यह [आत्मा]।
हन्तिhantiमारती है।
न हन्यतेna hanyateऔर न मारी जाती है।
अनुवाद

“जो आत्मा को मारने वाला मानता है, और जो इसे मरा हुआ मानता है — वे दोनों ही अज्ञान में हैं। क्योंकि आत्मा न मारती है और न मारी जा सकती है।”

संस्करण

5b93a939bec2 · प्रकाशित 2 जुल॰ 2026, 12:00:00 pm UTC

उपलब्ध भाषाएँRUENESHIZH

श्लोक बदलें इन कुंजियों से